1857 का
स्वातंत्र्य समर

विनायक दामोदर सावरकर

उन बलिदानी हुतात्माओं को, जिन्होंने 1857 के स्वातंत्र्य समर में अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।

वीर सावरकर रचित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ मात्र इतिहास की पुस्तक नहीं, यह तो स्वयं में इतिहास है। संभवतः, यह विश्व की पहली पुस्तक है, जिसे प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबधित होने का गौरव प्राप्त हुआ। इस पुस्तक के प्रकाशन की संभावना मात्र से सर्वशक्तिमान ब्रिटिश साम्राज्य-बीसवीं शती के प्रथम दशक में जहां कभी सूर्यास्त नहीं होता था-इतना थर्रा गया था कि पुस्तक का नाम, उसके प्रकाशक व मुद्रक के नाम-पते का ज्ञान न होने पर भी उसने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस पुस्तक को ही यह गौरव प्राप्त है कि सन् 1901 में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से 1947 में उसके प्रथम प्रकाशन तक के अड़तीस वर्ष लम्बे कालखं डमें


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1857 का
स्वातंत्र्य समर

विनायक दामोदर सावरकर

उन बलिदानी हुतात्माओं को, जिन्होंने 1857 के स्वातंत्र्य समर में अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।

वीर सावरकर रचित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ मात्र इतिहास की पुस्तक नहीं, यह तो स्वयं में इतिहास है। संभवतः, यह विश्व की पहली पुस्तक है, जिसे प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबधित होने का गौरव प्राप्त हुआ। इस पुस्तक के प्रकाशन की संभावना मात्र से सर्वशक्तिमान ब्रिटिश साम्राज्य-बीसवीं शती के प्रथम दशक में जहां कभी सूर्यास्त


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