स्वतंत्रता की अलख जगाने का इससे अधिक प्रभावी व सफल माध्यम क्या हो सकता है कि उनके समाने उस क्रांतियु˜, जो निकट भूत में घटा था और जिसकी याद अभी ताजा है, का शु˜ इतिहास प्रस्तुत कर दिया जाए। स्वाभाविक ही, ऐसा ज्वलनशील इतिहास गं्रथ ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लिए भारी डर का कारण बन गया था।
उन्हें कहीं से भनक लगी कि मूल ग्रंथ मराठी भाषा में लिखा गया है और भारत में कहीं उसे छापा जा रहा है। बंबई प्रांत गं्रथ मराठी भाषा में लिखा गया है और भारत में कहीं उसे छापा जा रहा है। बंबई प्रांत की पुलिस ने महाराष्ट्र के सभी प्रमुख छापेखानों पर एक साथ छापा मारा; किंतु सौभाग्य से जिस छापेखाने में वह छप रहा था उसके मालिक, जो स्वयं भी अभिनव भारत पार्टी से जुड़ा था, को अपने किसी पुलिसवाले मित्र से आसन्न छापे की जानकारी मिल गई। अतः छापा पड़ने के पहले ही पांडुलिपि को वहां से हटा
इस बीच लंदन में 10 मई, 1908 को 1857 की क्रांति की वर्षगांठ का आयोजन किया गया। इस अवसर के लिए सावरकर ने ‘व् डंतजले’ (ऐ शहीदो) शीर्षक से अंगे्रजी में चार पृष्ठ लंबे पैंफ्लेट की रचना की, जिसका इंडिया हाउस में आयोजित कार्यक्रम में तथा यूरोप व भारत में बड़े पैमाने पर वितरण किया गया। इंडिया आॅफिस लाइबे्ररी और ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी में लगातार एक वर्ष तक बैठने के कारण यह तो छिपा नहीं था कि सावरकर 1857 का अध्ययन कर रहे हैं; परंतु उनका