दिया गया और उसे लंदन न भेजकर सुरक्षित पेरिस पहुंचा दिया गया। वहां के भारतीय क्रांतिकारियों ने यह सोचकर कि जर्मनी में संस्कृत गं्रथों की मुद्रण परंपरा होने के कारण वहां देवनागरी लिपि के मराठी गं्रथ को छपवाना संभव होगा, पांडुलिपि को जर्मनी भेज दिया। किंतु निराशा हाथ लगी और मराठी पांडुलिपि वापस आ गई। अब क्रांतिकारी टोली ने निर्णय किया कि ग्रंथ का जल्दी-से-जल्दी अंगे्रजी भाषा में अनुवाद किया जाए, अतः उसके कई अध्यायों को अलग-अलग व्यक्तियों को अनुवाद के लिए बांट दिया गया। सुप्रसि˜ क्रांतिकारी वी.वी.एस.अय्यर के मार्गदर्शन में इंग्लैंड में आई.सी.एस और लाॅ की परीक्षा की तैयारी में लगे हुए कुछ मेधावी देशभक्त मराठी छात्रों ने शीघ्रातिशीघ्र मराठी गं्रथ का अंगे्रजी रूपांतर तैयार कर दिया। अब पुनः समस्या खड़ी हुई कि अंगे्रजी ग्रंथ का मुद्रण कहां से हो? ब्रिटिश गुप्तचर विभाग


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की सक्रियता के


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अध्ययन किस दिशा में जा रहा है, इसका कुछ आभास इस पैंफ्लेट की काव्यमयी ओजस्वी भाषा 1857 के शहीदों के माध्यम से भावी क्रांति का आह्नान थी। सावरकर ने लिखा-‘‘10 मई, 1857 को शुरू हुआ यु˜ 10 मई, 1908 को समाप्त नहीं हुआ है, वह तब तक नहीं रूकेगा जब तक उस लक्ष्य को पूरा करनेवाली कोई अगली 10 मई आएगी। ओ महान् शहीदों! अपने पूत्रों के इस पवित्र संघर्ष में अपनी पे्ररणादायी उपस्थिति से हमारी मदद करो। हमारे प्राणों में भी जादू का वह मंत्र फूंक दो जिसने


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