कारण इंग्लैंड के किसी छापेखाने में छपवाना निरापद नहीं था। पेरिस उन दिनों भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ था; किंतु उस समय तक जर्मनी के विरू˜ फ्रांस और ब्रिटेन का गठबंधन हो चुका था। अतः फ्रांस सरकार का गुप्तचर विभाग भी उन दिनों ब्रिटिश सरकार के दबाव में भारतीय क्रांतिकारियों के पीछे पड़ा हुआ था। जी.एम. जोशी का कहना है कि ‘‘ क्रांतिकारियों ने किसी प्रकार हाॅलैंड के एक छापेखाने को यह गं्रथ छापने के लिए तैयार कर लिया और ब्रिटिश गुप्तचर विभाग को अंधेरे में रखने के लिए प्रचारित कर दिया कि पुस्तक पेरिस में छप रही है।’’ जी.एम. जोशी के अनुसार, ‘‘हाॅलैंड में छपने के बाद पुस्तक का पूरा संस्करण क्रांतिकारियों के फ्रांस स्थित ठिकानों पर सुरक्षित पहुंच गया, जहां से उसके वितरण की व्यवस्था की गई।’’

अब हम दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित फाइलों पर पहुंच जाते हैं। इन फाइलों के अनुसार,


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तुमको एकता के सूत्र में गूंद दिया था।’’ इस पैंफ्लेट के द्वारा सावरकर ने 1857 को एक मामूली सिपाही विद्रोह की छवि से बाहर निकालकर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य यु˜ के आसन पर प्रतिष्ठित कर दिया। 1910 में सावरकर की गिरफ्तारी के बाद उनपर राजद्रोह का मुकदमा चला और उन्हें पचास वर्ष लंबे कारावास की सजा देने वाले निर्णय में ‘ऐ शहीदों’ पैंफ्लेट की उपर्युक्त पंक्तियां ही उद्धृत की गई थीं।

10 मई, 1908 को लंदन के इंडिया हाउस में 1857 की क्रांति का वर्षगांठ समारोह अनूठा


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