न्यू स्काॅटलैंड यार्ड ने 6 नवंबर, 1908 को पुस्तक के छपने की रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को दी, जो तुरंत भारत सरकार को भेजी गई 14 दिसंबर, 1908 के तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय लाॅर्ड मिंटों ने आदेश यिा कि पुस्तक के भारत प्रवेश को हमें रोकना होगा। गुप्तचर विभाग के निदेशक ने 18 दिसंबर को लिखा कि निस्संदेह यह पुस्तक बहुत आपत्तिजनक होगी और इसे समुद्र कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के अंतर्गत प्रतिबंधित करना ठीक होगा और उस पर लेखक के नाम की सही जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। यह जानकारी तभी मिल सकती है, जब एच.ए. स्टुअर्ट नामक अधिकारी ने टिप्पणी लिखी कि अच्छा यह होगा कि हम पोस्ट आॅफिस ऐक्ट के अंतर्गत नोटिस जारी करें। निदेशक, गुप्तचर विभाग सर एडवर्ड हेनरी को इंग्लैंड का गुप्तचर विभाग पुस्तक का सही नाम पता लगाने में असफल रहा। अंतत 11 जनवरी में छपी है।’’
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था। इंग्लैंड और यूरोप के सैकड़ों भारतीय देशभक्त उसमें एकत्र हुए। माथे पर चंदन लगाकर 1857 के शहीदों का पुण्य स्मरण करते हुए मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए सुखों को ठोकर मारकर सर्वस्वार्पण का संकल्प लिया गया। 1857 की क्रांति की संदेशवाहक चपाती का प्रतीक-स्वरूप वितरण हुआ। क्रांति की आग प्रज्वलित करने वाले उक्त पैंफ्लेट का वितरण और वाचन हुआ। इस अनूठे कार्यक्रम का समाचार-पत्रों पर छा गया। सभी पत्रों ने उस पैंफ्लेट को राजद्रोह और क्रांति की चिनगारी सुलगानेवाला बताया।