कहते हैं अंधेरे में तीर चलाना। भारतीय पोस्ट आॅफिस के महानिदेशक ने सवाल उठाया कि यदि वह पुस्तक माराठी भाशा में है तो बंबई, मध्य प्रांत व राजपुताना सर्किल के डाकखानों में ही उसे रोका जा सकेगा; क्योंकि अन्य प्रांतों में मराठीभाषी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं। 2 जनवरी 1909 को एक नया सवाल खड़ा हो गया कि अगर वह मराठी पुस्तक जर्मनी से छपकर भारत आ रही है तो उसे समुद्री डाक में ही रोकना होगा; पर काफी सोच-विचार के बाद पोस्ट आॅफिस ऐक्अ के अंतर्गत ही पुस्तक पर
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प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया; क्यांेकि समुद्र कस्टम्स ऐक्ट के अंतर्गत लिये गए किसी भी निर्णय को इंग्लैंड व यूरोप में भी प्रचारित करना पड़ता, जिससे वहां के भारतीय क्रांतिकारी सतर्क हो जाते हैं।
20 जुलाई, 1909 को घबराई हुई बंबई सरकार ने भारत सरकार को तार भेजा कि इस पुस्तक के वितरण को रोकना अत्याधिक
ब्रिटिश गुप्तचर विभाग बड़ी तत्परता से सावरकर की पुस्तक की पांडुलिपि की खोज में लग गया। ब्रिटिश सरकार की आंखों में धूल झोंककर इस पांडुलिपि की अनेक
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देशों में यात्रा, प्रकाशन और प्रकाशन पूर्व प्रतिबंध की रोमांचकारी कहानी हमें 10 जनवरी, 1947 को बंबई से प्रकाशित प्रथम अधिकृत संस्करण में मराठी साप्ताहिक ‘अग्रणी’ के संपादक श्री जी.एम.जोशी की कलम से तथा दिल्ली स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित फाइलों में मिलती है। जी.एम.जोशी लिखते हैं कि ‘‘सावरकर ने अपनी पहली