महत्त्वपूर्ण है और वह पुस्तक किसी भी क्षण भारी मात्रा में भारत पहुंच सकती है। अतः हम भारत सरकार से विनम्रतापूर्वक भीख मांगते हैं कि बिना एक क्षण की देरी लगाए समुद्र कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के अंतर्गत पुस्तक के भारत प्रवेष पर प्रतिबंध का आदेष जारी करें। जहां तक पुस्तक के परिचय का संबंध है, अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार उसे भारतीय विद्रोह पर विनायक दामोदर सावरकर ने लिखा है। पुस्तक को पूरी तरह घेरने की दृष्टि से उसका परिचय यथासंभव व्यापक कर दिया जाए। आदेश जारी होते ही उसे इंग्लैंड प्रेषित कर दिया जाए। 21 जुलाई, 1990 को भारत सरकार के अधिकारी एच.ए.स्टुअर्ट ने टिप्पणी लिखी कि पुस्तक मराठी में होने के कारण बंबई सरकार बहुत घबराई हुई है। अतः प्रचार की परवाह न करके भी समुद्र कस्टम्स ऐक्ट के अंतर्गत प्रतिबंध का आदेष जारी करना उचित रहेगा। किंतु


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रचना ‘मेजिनी का चरित्र’ की तरह ही इस पांडुलिपि को भी प्रकाशन हेतु अपने बड़े भाई बाबाराव सावरकर के पास नासिक भेज दिया। ब्रिटिश गुप्तचर एजेंसियां उस पांडुलिपि की खोज में लगी हुई थी। सावरकर ने पेरिस से प्रकाशित अपने उद्देश्यों को स्पष्ट किया। उन्होंने लिखा कि वे इस पुस्तक के द्वारा देशवासियों के मन में मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए द्वितीय निर्णायक युद्व का संकल्प जगाना चाहते हैं। वे उस इतिहास के माध्यम व दिशा-निर्देश भी करना चाहते हैं। पूरे भारत में स्वतंत्रता समर के लिए संगठन


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