जानकारी हो जाएगी और वे प्रतिबंध के आदेश के उल्लंघन के नए-नए रास्ते खोज लेंगे।’’

उसी दिन 21 जुलाई को क्रिमिनल इंटेलिजेंस के उप-निदेशक ए.बी. बर्नार्ड ने लिखित सूचना दी कि हमारी जानकारी के अनुसार सावरकर की पुस्तक का अभी तक केवल अंगे्रजी संस्करण ही छप पाया है और उसका शीर्षक’ 1857 की क्रांति का इतिहास’ या ‘1857 का इतिहास’ रखा गया है। पुस्तक का प्रकाशन कार्य 24 जून तक पूर्ण हो जाना था। अतः अगली डाक से उसके भारत पहुंचने की पूरी संभावना है। इसका अर्थ है कि उसकी प्रतियां पहले ही रवाना की जा चुकी हैं और इस समय रास्ते


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में होंगी। अतः आदेश को तार द्वारा इंग्लैंड भेजने से भी पुस्तकों का जहाज पर लदान रोका नहीं जा सकेगा। 22 जुलाई को भारत सरकार के एक अधिकारी एम.एम.एस. गुब्बाय ने आपत्ति उठाई कि पुस्तक के विवरण की भाशा समुद्री कस्टम्स


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प्रांत गं्रथ मराठी भाषा में लिखा गया है और भारत में कहीं उसे छापा जा रहा है। बंबई प्रांत की पुलिस ने महाराष्ट्र के सभी प्रमुख छापेखानों पर एक साथ छापा मारा; किंतु सौभाग्य से जिस छापेखाने में वह छप रहा था उसके मालिक, जो स्वयं भी अभिनव भारत पार्टी से जुड़ा था, को अपने किसी पुलिसवाले मित्र से आसन्न छापे की जानकारी मिल गई। अतः छापा पड़ने के पहले ही पांडुलिपि को वहां से हटा दिया गया और उसे लंदन न भेजकर सुरक्षित पेरिस पहुंचा दिया गया। वहां के भारतीय क्रांतिकारियों ने


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