ऐक्ट की धारा 19 के लिए पर्याप्त नहीं है। इस कानूनी आपत्ति ने भारत सरकार के सामने नया संकट खड़ा कर दिया। क्या वे कानूनी आवश्यकता को पूरी करने के लिए पुस्तक को अपनी आंखों से देखने तक प्रतीक्षा करते रहें? इसका अर्थ होगा भारत में पुस्तक का प्रवेश, जिसे रोकने के लि वे छह महीने से यह व्यायाम कर रहे हैं। बंबई सरकार अगले ही क्षण आदेष जारी होने के लिए छटपटा रही थी। दिन भर की माथा-पच्ची के बाद सरकार ने 22 जुलाई, 1909 को थोड़े संशोधन के बाद पुस्तक का विवरण देने के लिए निम्नलिखित शब्दावली को अपनाया-

‘‘भारतीय विद्रोह के बारे में वी.डी. सावरकर द्वारा मराठी में लिखित पुस्तक या पैंफ्लेट, जिसके जर्मनी में छपने की रिपोर्ट मिली है और उसका अंगे्रजी अनुवाद।’’ 23 जुलाई, 1909 की इस शब्दावली के साथ समुद्री कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के अंतर्गत पुस्तक पर प्रतिबंध का आदेश अंततः जारी कर दिया गया।


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यह सोचकर कि जर्मनी में संस्कृत गं्रथों की मुद्रण परंपरा होने के कारण वहां देवनागरी लिपि के मराठी गं्रथ को छपवाना संभव होगा, पांडुलिपि को जर्मनी भेज दिया। किंतु निराशा हाथ लगी और मराठी पांडुलिपि वापस आ गई। अब क्रांतिकारी टोली ने निर्णय किया कि ग्रंथ का जल्दी-से-जल्दी अंगे्रजी भाषा में अनुवाद किया जाए, अतः उसके कई अध्यायों को अलग-अलग व्यक्तियों को अनुवाद के लिए बांट दिया गया। सुप्रसि˜ क्रांतिकारी वी.वी.एस.अय्यर के मार्गदर्शन में इंग्लैंड में आई.सी.एस और लाॅ की परीक्षा की तैयारी


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