राष्ट्रीय अभिलेखागार में सुरक्षित सरकारी फाइलों से उपलब्ध वायसराय स्तर तक की इन उच्च-स्तरीय टिप्पणियों से स्पष्ट होता है कि 6 नवंबर, 1908 से 23 जुलाई, 1909 तक पूरे नौ महीने ब्रिटिश गुप्तचर विभाग एवं भारत सरकार जी-तोड़ कोशिश करके भी पुस्तक की भाषा, शीर्षक, मुद्रण स्थान एवं उस प्रकाशित लेखक के नाम के बारे में सही जानकारी नहीं पा सके और अंधेरे में ही तीर चलाते रहे। प्रकाशन के पूर्व ही किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की ब्रिटिश सरकार की इस हताश कार्यवाही ने उसे बहुत हास्यास्पद स्थिति में ला दिया। अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य की अलमबरदार होने का ढिंढोरा विश्व भर में पीटनेवाली अपनी सरकार की वकालत करने में ब्रिटिश समाचार-पत्र एवं बु˜िजीवी स्वयं को असमर्थ पाने लगे। इस पर सावरकर ने सर्वाधिक प्रतिष्ठित दैनिक ‘द लंदन टाइम्स’ में संपादक के नाम पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार पर तीखा


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में लगे हुए कुछ मेधावी देशभक्त मराठी छात्रों ने शीघ्रातिशीघ्र मराठी गं्रथ का अंगे्रजी रूपांतर तैयार कर दिया। अब पुनः समस्या खड़ी हुई कि अंगे्रजी ग्रंथ का मुद्रण कहां से हो? ब्रिटिश गुप्तचर विभाग


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की सक्रियता के कारण इंग्लैंड के किसी छापेखाने में छपवाना निरापद नहीं था। पेरिस उन दिनों भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ था; किंतु उस समय तक जर्मनी के विरू˜ फ्रांस और ब्रिटेन का गठबंधन हो चुका था। अतः फ्रांस सरकार का गुप्तचर विभाग भी उन दिनों ब्रिटिश सरकार के दबाव में भारतीय


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