उसके कितने ही गुप्त संस्करण अनेक भाषाओं में छपकर देश-विदेश में वितरीत होते रहे। उस पुस्तक को छिपाकर भारत में लाना एक साहसपूर्ण क्रांति-कर्म बन गया। वह देशभक्त क्रांतिकारियों की ‘गीता’ बन गई। उसकी अलभ्य प्रति को कहीं से खोज पाना सौभाग्य माना जाता था। उसकी एक-एक प्रति गुप्त रूप से एक हाथ से दूसरे हाथ होती हुई अनेक अंतःकरणों में क्रांति की ज्वाला सुलगा जाती थी।

इतिहास की इस क्रंातिकारी पुस्तक का इतिहास आरंभ होता है सन् 1906 से, जब क्रांति-मंत्र में दीक्षित युवा विनायक दामोदर सावरकर वकालत पढ़ने के नाम पर शत्रु के घर इंग्लैंड में ही मातृभूमि का स्वातंत्र्य समर लड़ने पहुंच जाते हैं। प्रखर राष्ट्रभक्त एवं संस्कृत के महाविद्वान पं. श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित ‘इंडिया हाउस’ को अपनी क्रांति-साधना का केंन्द्र बना लेते हैं। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए व्याकुल युवकों का संगठन खड़ा कर लेते हैं। सन् 1907 में 1857 की क्रांति की


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नहीं होता था-इतना थर्रा गया था कि पुस्तक का नाम, उसके प्रकाशक व मुद्रक के नाम-पते का ज्ञान न होने पर भी उसने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। इस पुस्तक को ही यह गौरव प्राप्त है कि सन् 1901 में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से 1947 में उसके प्रथम प्रकाशन तक के अड़तीस वर्ष लम्बे कालखं डमें उसके कितने ही गुप्त संस्करण अनेक भाषाओं में छपकर देश-विदेश में वितरीत होते रहे। उस पुस्तक को छिपाकर भारत में लाना एक साहसपूर्ण क्रांति-कर्म बन गया। वह


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