को गुमराह करने के लिए जान-बुझकर इंग्लैंड में छापा गया? सत्य चाहे जो हो, ब्रिटिश सरकार की भरसक कोशिशों के बावजूद पुस्तक का अंगे्रजी संस्करण छप ही गया। उसका शीर्षक था-‘एक भारतीय राष्ट्रवाद’।

अब शुरू हुआ पुस्तक का वितरण अभियान। इस अभियान की कहानी पुस्तक के प्रकाशन अभियान से भी अधिक रोमांचकारी है। पुस्तक की प्रतियों को चोरी-छिपे भारत पहुंचाने के लिए उन्हें ‘पिकनिक पेपर्स’, ‘स्काॅट की रचनाएं’, ‘डाॅन क्विग्जोट’ जैसी लोकप्रिय निरापद पुस्तकों के नकली आवरणों के भीतर छिपा दिया जाता था। उन दिनों उस पुस्तक की एक प्रति को भी सुरक्षित भारत पहुंचा देने को सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सरकार को चुनौति देने का साहस भरा क्रांतिकारी कार्य माना जाने लगा था। इसके लिए नए-नए तरीके खोजे गए। अपने सामन की पेटी में नकली तली के नीचे छिपाकर पुस्तक लाना एक तरीका था। इस तरीके को अपनानेवालों में सिकंदर हयात खान और आसफ अली जैसे प्रसिद्व लोगों के नाम भी आते हैं।


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और उस पर लेखक के नाम की सही जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है। यह जानकारी तभी मिल सकती है, जब एच.ए. स्टुअर्ट नामक अधिकारी ने टिप्पणी लिखी कि अच्छा यह होगा कि हम पोस्ट आॅफिस ऐक्ट के अंतर्गत नोटिस जारी करें। निदेशक, गुप्तचर विभाग सर एडवर्ड हेनरी को इंग्लैंड का गुप्तचर विभाग पुस्तक का सही नाम पता लगाने में असफल रहा। अंतत 11 जनवरी में छपी है।’’

इसे कहते हैं अंधेरे में तीर चलाना। भारतीय पोस्ट आॅफिस के महानिदेशक ने सवाल उठाया कि यदि वह पुस्तक


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