पुस्तक की भाषा तो ओजस्वी थी ही, उसमें प्रस्तुत तथ्यों को चुनौति दे पाना ब्रिटिश इतिहासकारों के लिए संभव नहीं हो रहा था। ‘टाइम्स’ संवाददाता वेलेंटाइन चिरोल ने सन् 1910 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘इंडियन अनरेस्ट’ में लिखा कि ‘‘यह भारतीय विद्रोह का अद्भुत इतिहास है, जिसमें गहन शोध और तथ्यों की भयंकर विकृति का मिश्रण है। इसमें एक महान् साहित्यिक प्रतिभा ने राक्षसी घृणा को परोसा है।’’


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ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशन-पूर्व प्रतिबंध की असामान्य घोषणा ने पुस्तक को एकदम लोकप्रिय बना दिया। प्रत्येक देशभक्त युवा अंतःकरण उसे पढ़ने के लिए छटपटाने लगा। उस दुर्लभ पुस्तक की एक-एक प्रति उस जमाने में 300 रूपए में गुप्त रूप से बिकने लगी। उसे पढ़ना और पढ़वाना क्रांति-धर्म बन गया। एक प्रति गुप्त रूप से अनेक हाथों में क्रम से घूमती रहती। आतुर युवक पूरी-पूरी रात लालटेन की


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माराठी भाशा में है तो बंबई, मध्य प्रांत व राजपुताना सर्किल के डाकखानों में ही उसे रोका जा सकेगा; क्योंकि अन्य प्रांतों में मराठीभाषी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं। 2 जनवरी 1909 को एक नया सवाल खड़ा हो गया कि अगर वह मराठी पुस्तक जर्मनी से छपकर भारत आ रही है तो उसे समुद्री डाक में ही रोकना होगा; पर काफी सोच-विचार के बाद पोस्ट आॅफिस ऐक्अ के अंतर्गत ही पुस्तक पर


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प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया गया; क्यांेकि समुद्र कस्टम्स ऐक्ट के अंतर्गत लिये गए किसी भी निर्णय को


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