के क्रांति संदेश के साथ रानी लक्ष्मीबाई का चित्र छापा गया। चित्र के नीचे सूचना छापी गई-‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक को पाने के लिए मैडम बी.आर. कामा को पेरिस क ेपते पर पत्र लिखें या न्यूयाॅर्क की एफ.एच. पब्लिकेशन कमेटी का पत्र लिखें।

अंगे्रज बुद्विजीवियों, राजनीतिज्ञों में भी इस पुस्तक को पढ़ने की उत्कंठा जाग्रत


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हुई । वे कैसे भी पुस्तक की प्रति प्राप्त करके अपने मित्रों को एक अलभ्य उपहार के नाते भेंट करते। ऐसे ही अंगे्रज मित्र सर चाल्र्स क्लीवलैंड से खिलाफत आंदोलन के प्रसिद्व नेता मुहम्मद अली को यह पुस्तक पढ़ने को मिली थी।

सन् 1910 में भारतीय क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश दमन-चक्र घूमा। वीर सावरकर लंदन में गिरफ्तार करके भारत लाए गए और उन्हें दो जन्मों का कारावास दंड देकर काला पानी (अंडमान) भेज दिया गया। भारत में भी बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ हुई।


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अंतर्गत प्रतिबंध का आदेष जारी करना उचित रहेगा। किंतु मेरी जानकारी है कि उस पुस्तक के अंगे्रजी और मराठी दोनों भाषाओं में संस्करण छप चुके हैं। अंगे्रजी संस्करण को लंदन में ए. बोन्नेर ने छापा है। पोस्ट आॅफिस ऐक्ट के अंतर्गत 11 जनवरी का आदेष केवल मराठी संस्करण पर लागू होता है, अतः आदेश की भाषा में संशोधन करना होगा। संशोधित आदेश में भाषा रखी जाए, ‘भारतीय विद्रोह पर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा मारठी में लिखित पुस्तक या पैंफ्लेट और उसका अंगे्रजी अनुवाद या रूपांतर।’


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