बड़ी संख्या में उन्हें अंडमान टापू भेज दिया गया। इस आघात से थोड़ा संभलते ही मैडम कामा, लाला हरदयाल एवं वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय आदि क्रांतिकारियों ने ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ का अंग्रेजी में दूसरा संस्करण प्रकाशित किया। पहला संस्करण तो निःशुल्क वितरित किया गया था। किंतु इस संस्करण का मूल्य रखा गया, ताकि क्रांतिकारी दल को थोड़ा-बहुत आर्थिक सहारा मिल सके।

इस बीच लाला हरदयाल फरवरी 1911 में अमेरिका के पश्चिमी तट पर सान फ्रांसिस्को पहुंच गए। वहां बड़ी संख्या में पंजाबी सिक्ख व गैर-केशधारी बसे हुए थे। लाला हरदयाल ने सन् 1913 में गदर पार्टी की स्थापना की। नवंबर 1913 में उन्होंने उर्दू में ‘गदर’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और जनवरी 1914 से गुरूमुखी लिपि में पंजाबी संस्करण शुरू किया। हरदयाल के मन पर सावरकर की रचना की गहरी छाप बैठी हुई थी। वे


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साथ ही स्टुअर्ट ने यह भी लिखा कि ‘‘बंबई सरकार का यह कथन कि घोषण-पत्र को तुरंत इंग्लैंड सूचित किया जाए, पुनर्विचार चाहता है। मेरे विचार से इंग्लैंड सूचना न भेजी जाए, क्योंकि पुस्तक की अधिक-से-अधिक प्रतियों को जब्त करने के लिए आवश्यक है कि इंग्लैंड में ही उसका जहाज से लदान रोका जाए। वहां नोटिस भेजने का परिणाम होगा कि सावरकर के मित्रगण को इसकी जानकारी हो जाएगी और वे प्रतिबंध के आदेश के उल्लंघन के नए-नए रास्ते खोज लेंगे।’’

उसी दिन 21 जुलाई को


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