उसे दूसरे स्वातंत्र्य समर का पथ-प्रदर्शक मानते थे। इसलिए उन्होंने ‘गदर’ पत्रिका के उर्दू एवं पंजाबी संस्करणों में उस पुस्तक के अंशों को धारावाहिक छापना आरंभ कर दिया। सार्वजनिक सभाओं में भी उनका वाचन किया जाता। इस प्रकार इस पुस्तक के उर्दू व पंजाबी अनुवाद भी तैयार हो गए। सावरकर ने जो आशा की थी सन् 1857 का इतिहास लिखने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य देशभक्तों को द्वितीय स्वातंत्र्य समर की प्रेरणा व संगठन योजना प्रदान करना है, उसे उन्होंने प्रथम विश्वयुद्व के समय भारतीय सेनाओं में विद्रोह का मंत्र फूंका। ‘कोमागाटामारू’ नामक जहाज से क्रांतिकारियों के जत्थे शस्त्रास्त्रों के साथ भारत की ओर रवाना हुए। हांगकांग, सिंगापुर और बर्मा में स्थित ब्रिटिश सेनाओं में बगावत हुई। यह सब सावरकर द्वारा रचित ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक का ही चमत्कार था।
इसके बाद इस गं्रथ का एक संस्करण
क्रिमिनल इंटेलिजेंस के उप-निदेशक ए.बी. बर्नार्ड ने लिखित सूचना दी कि हमारी जानकारी के अनुसार सावरकर की पुस्तक का अभी तक केवल अंगे्रजी संस्करण ही छप पाया है और उसका शीर्षक’ 1857 की क्रांति का इतिहास’ या ‘1857 का इतिहास’ रखा गया है। पुस्तक का प्रकाशन कार्य 24 जून तक पूर्ण हो जाना था। अतः अगली डाक से उसके भारत पहुंचने की पूरी संभावना है। इसका अर्थ है कि उसकी प्रतियां पहले ही रवाना की जा चुकी हैं और इस समय रास्ते
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में होंगी। अतः आदेश