भारत में भगत सिंह के क्रांतिकारी दल ने प्रकाशित किया। सन् 1912 में शहीद भगत सिंह द्वारा इस पुस्तक के प्रकाशन की कहानी उनके एक अनन्य सहयोगी एवं प्रसिद्व समाजवादी नेता राजाराम शास्त्री के शब्दों में ही कहना ठीक रहेगा। ‘अमर शहीदों के संस्मरण’ नामक अपनी रचना में राजाराम शास्त्री लिखते हैं
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‘‘वीर सावरकर द्वार लिखित’ 1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक ने भगत सिंह को बहुत अधिक प्रभावित किया था। यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी। मैंने इस पुस्तक की बहुत प्रशंसा सुनी थी और इसे पढ़ने का बहुत ही इच्छुक था। पता नहीं कहां से भगत सिंह को यह पुस्तक प्राप्त हो गई थी। वह एक दिन इसे मेरे पास ले आए। जिससे ली होगी उसे जल्द वापस करनी होगी, इसलिए वह मुझे बहुत कहने पर देने को तैयार नहीं हो रहे थे। पर जब मैंने जल्द-से-जल्द पढ़कर उसे अवश्य
को तार द्वारा इंग्लैंड भेजने से भी पुस्तकों का जहाज पर लदान रोका नहीं जा सकेगा। 22 जुलाई को भारत सरकार के एक अधिकारी एम.एम.एस. गुब्बाय ने आपत्ति उठाई कि पुस्तक के विवरण की भाशा समुद्री कस्टम्स ऐक्ट की धारा 19 के लिए पर्याप्त नहीं है। इस कानूनी आपत्ति ने भारत सरकार के सामने नया संकट खड़ा कर दिया। क्या वे कानूनी आवश्यकता को पूरी करने के लिए पुस्तक को अपनी आंखों से देखने तक प्रतीक्षा करते रहें? इसका अर्थ होगा भारत में पुस्तक का प्रवेश, जिसे रोकने के लि वे