लौटा देने का पक्का वायदा किया, तब उन्होंने वह मुझे केवल 3 घंटे के लिए पढ़ने को दी। उसको मैं कभी नहीं भूल सकता। मैंने एम वक्त खाना नहीं खाया और रात-दिन उसे पढ़ता ही रहा। पुस्तक ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया। भगत सिंह के अपने पर मैंने पुस्तक की बहुत प्रशंसा की। कुछ समय बाद भगत सिंह ने एक दिन मुझसे कहा कि ‘यदि तुम कुछ परिश्रम करो और मदद करने के लिए तैयार हो जाओ तो गुप्त रूप से इस पुस्तक को प्रकाशित करने का उपाय सोचा जाए।’ मैं पूर्ण रूप से सहायता करने को तैयार हो गया।

‘‘भगत सिंह ने किसी प्रेस में प्रबंध कर दिया। वह प्रतिदिन रात के समय कुछ मैटर मुझे प्रूफ देखने को दे जाते थे; मैं रात मंे उसे देखकर प्रूफ ठीक करके रख छोड़ता था। दूसरे दिन भगत सिंह उस ले जाते थे। कुछ दिनों तक बराबर यह सिलसिला चलता रहा। इस पुस्तक को


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छह महीने से यह व्यायाम कर रहे हैं। बंबई सरकार अगले ही क्षण आदेष जारी होने के लिए छटपटा रही थी। दिन भर की माथा-पच्ची के बाद सरकार ने 22 जुलाई, 1909 को थोड़े संशोधन के बाद पुस्तक का विवरण देने के लिए निम्नलिखित शब्दावली को अपनाया-

‘‘भारतीय विद्रोह के बारे में वी.डी. सावरकर द्वारा मराठी में लिखित पुस्तक या पैंफ्लेट, जिसके जर्मनी में छपने की रिपोर्ट मिली है और उसका अंगे्रजी अनुवाद।’’ 23 जुलाई, 1909 की इस शब्दावली के साथ समुद्री कस्टम्स ऐक्ट


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