का स्वातंत्र्य समर’ पर से प्रतिबंध हटाने की मांग ने एक जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। एक सावरकर-भक्त एम.एस.गोखले ने गुप्त रूप से इस पुस्तक को छापकर घोषणा कर दी कि यदि पुस्तक पर से प्रतिबंध न हटाया गया तो वे सार्वजनिक रूप से पुस्त की ब्रिकी करके प्रतिबंध के कानून का


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उल्लघंन करेंगे। इस विषय पर प्रबल जन-भावनाओं को पहचानकर बंबई प्रांत की कांगे्रस सरकार ने मई 1946 में इस पुस्तक सहित सावरकर की सभी रचनाओं पर ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के अड़तीस वर्ष पुराने आदेश को रद्द कर दिया। तब कहीं जाकर जनवरी 1947 में महान् एतिहासिक गं्रथ का प्रथम कानूनी संस्करण प्रकाशित हो पाया।

10 जनवरी, 1947 का जी.एम.जोशी ने जब इस पुस्तक के प्रथम अधिकृत कानूनी संस्करण की भूमिका में इस पुस्तक का रोमांचकारी इतिहास लिखा तब तक


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उस पर छापा क्यों नहीं मारा गया? क्यों 23 जुलाई, 1909 को प्रतिबंध लगानेवाली विज्ञप्ति में पुस्तक का परिचय गोलमोल भाषा में देना पड़ा? इसका निर्णयकरन अभी भी कठिन हो रहा है कि उस पुस्तक का प्रथम गुप्त संस्करण हाॅलैंड में छपा या इंग्लैंड में। जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं कि सन् 1947 में प्रकाशित प्रथम अधिकृत संस्करण में श्री.जी.एम.जोशी द्वारा 11 जनवरी, 1947 की तिथि में लिखित प्राक्कथन के अनुसार वह संस्करण हाॅलैंड में छपा था, किंतु उसी संस्करण के प्रारंभ में छिपाने और ब्रिटिश


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