पुस्तक की मूल मराठी पांडुलिपि उपलब्ध नहीं हुई थी और यह मान लिया गया था कि सावरकर द्वारा 1901 में लिखित सिक्ख इतिहास की पांडुलिपि के समान यह भी सदा के लिए खो गई है। जी.एम.जोशी लिखते हैं कि ‘‘सावरकर की गिरफ्तारी के बाद मूल मराठी पुस्तक की पांडुलिपि को मैडम कामा के पास पेरिस भेज दिया गया थां उन्होंने ब्रिटिश गुप्तचर विभाग के एजेंटों के हाथ में पड़ने से बचाने के लिए उस पांडुलिपि को बैंक आॅफ फ्रांस में अपने लाॅकर में सुरक्षित छिपा दिया। फ्रांस पर जर्मनी के आक्रमण के कारण फ्रांस का शासन-तंत्र बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया। मैडम कामा की भी मृत्यु हो गई। फलतः बहुत खोजबीन के बाद भी उस पांडुलिपि कोई पता नहीं लग पाया। इस प्रकार मराठी साहित्य का एक महान् पुष्प् खो गया और उसकी प्राप्ति की सभी आशाएं समाप्त हो गई।’’
किंतु वीर सावरकर के जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार,
सरकार को गुमराह करने के लिए जान-बुझकर इंग्लैंड में छापा गया? सत्य चाहे जो हो, ब्रिटिश सरकार की भरसक कोशिशों के बावजूद पुस्तक का अंगे्रजी संस्करण छप ही गया। उसका शीर्षक था-‘एक भारतीय राष्ट्रवाद’।
अब शुरू हुआ पुस्तक का वितरण अभियान। इस अभियान की कहानी पुस्तक के प्रकाशन अभियान से भी अधिक रोमांचकारी है। पुस्तक की प्रतियों को चोरी-छिपे भारत पहुंचाने के लिए उन्हें ‘पिकनिक पेपर्स’, ‘स्काॅट की रचनाएं’, ‘डाॅन क्विग्जोट’ जैसी लोकप्रिय निरापद पुस्तकों के नकली आवरणों