‘‘भारत की स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद वह पांडुलिपि सावरकर के पास बड़े नाटकीय ढंग से वापस लौट आई।’’ उनके अनुसार, ‘‘अभिनव भारत’ के एक सदस्य गोआ निवासी जे.डी.एस. कोरिन्हो फ्रांस स्थित पुर्तगाली दूतावास की सहायता से उन उथल-पुथल के दिनों में उस पांडुलिपि को लेकर पहले पुर्तगाल और वहां से अमेरिका पहुंच गए। वे वाशिंगटन के एक काॅलेज में शिक्षक हो गए। तमाम कठिनाइयों और संकटों से जूझकर भी उन्होंने अड़तीस साल तक इस बहुमूल्य पांडुलिपि को सुरक्षित संजोकर रखा और भारत के स्वाधीन होने पर डाॅ. डी.वाई. गोहकर नामक एक सज्जन के माध्यम से उसे सावरकर के पास वापस भेज दिया।’’ हरींद्र श्रीवास्तव अपनी पुस्तक ‘फाइव स्टोर्मी ईयर्स: सावरकर इन लंदन’ में इस कहानी में इतनी जानकारी और जोड़ते हैं कि ‘‘डाॅ. गोहकर उस समय अमेरिका में पढ़ रहे थे और अब महाराष्ट्र राज्य


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के भीतर छिपा दिया जाता था। उन दिनों उस पुस्तक की एक प्रति को भी सुरक्षित भारत पहुंचा देने को सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सरकार को चुनौति देने का साहस भरा क्रांतिकारी कार्य माना जाने लगा था। इसके लिए नए-नए तरीके खोजे गए। अपने सामन की पेटी में नकली तली के नीचे छिपाकर पुस्तक लाना एक तरीका था। इस तरीके को अपनानेवालों में सिकंदर हयात खान और आसफ अली जैसे प्रसिद्व लोगों के नाम भी आते हैं।

पुस्तक की भाषा तो ओजस्वी थी ही, उसमें प्रस्तुत तथ्यों को चुनौति दे पाना ब्रिटिश इतिहासकारों


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