लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष हैं।’’ हरींद्र के अनुसार, ‘‘ पांडुलिपि सावरकर को मई 1949में प्राप्त हुई; पर उसमें वे दे अध्याय नहीं थे, जिन्हें ब्रिटिश गुप्तचर तंत्र ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगने से पूर्व चोरी कर लिया था’’ उनका कहना है कि वीर सावरकर के भतीजे बालाराव सावरकर ने आवश्यक संशोधन करके मराठी गं्रथ को भी प्रकाशित कर दिया है।


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जनवरी 1947 के अंगे्रजी संस्करण में पुस्तक की यात्रा कथा को जी.एम.जोशी ने बालाराव के साथ मिलकर लिखा है। उस संस्करण के प्रकाशन की अनुमति स्वयं वीर सावरकर ने फोनिक्स प्रकाशन गृह को दी थी। तब वश्य ही जी. एम. जोशी एवं बाल सावरकर द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई पुस्तक-गाथा को वीर सावरकर ने देख लिया होगा। यहां कुछ प्रश्न खड़े होते है कि यदि मूल पांडुलिपि मैडम कामा के बैंक लाॅकर में सुरक्षित थी तो वह कोरिन्हो के पास कब, कैसे


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के लिए संभव नहीं हो रहा था। ‘टाइम्स’ संवाददाता वेलेंटाइन चिरोल ने सन् 1910 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘इंडियन अनरेस्ट’ में लिखा कि ‘‘यह भारतीय विद्रोह का अद्भुत इतिहास है, जिसमें गहन शोध और तथ्यों की भयंकर विकृति का मिश्रण है। इसमें एक महान् साहित्यिक प्रतिभा ने राक्षसी घृणा को परोसा है।’’


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ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशन-पूर्व प्रतिबंध की असामान्य घोषणा ने पुस्तक को एकदम लोकप्रिय बना दिया। प्रत्येक देशभक्त युवा अंतःकरण उसे पढ़ने के लिए छटपटाने लगा। उस


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