गया। क्या उन्होंने मराठी गं्रथ की पांडुलिपि के इतिहास पर कहीं कोई प्रकाश डाला? ये सभी प्रश्न पुस्तक के इतिहास को रहस्यपूर्ण बना देते हैं।
1957 में 1857 की क्रांति की शताब्दी के अवसर पर पुनः यह असमंजस खड़ा हुआ कि उस घटना को क्या कहें-गदर, क्रांति या स्वातंत्र्य समर? वरिष्ठ इतिहासकार आर.सी.मजूमदार ने उसे ‘सिपाही विद्रोह’ कहा तो उन्हीं के शिष्य डाॅ, एस.बी.चैधरी ने उसे ‘जन विद्रोह’ का शीर्षक दिया। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने उसे ‘1587 का विद्रोह’ कहा। भारत सरकार ने विवाद से बचने के लिए इतिहासकार एस.एन. सेन द्वारा
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लिखित पुस्तक में केवल ‘1587’ जैसा नपुंसक शीर्षक अपनाया। पर, दो वर्ष बाद ही सन् 1959 में मास्को से सोवियत संघ ने अमेरिका के एक दैनिक पत्र ‘न्यूयाॅर्क डेली ट्रिब्यून’ में कार्ल माक्र्स एवं फ्रेडरिक एंगिल्स द्वारा 1857 की क्रांति पर लेखों का एक संकलन
किया। एक फ्रांसिसि क्रांतिकारी व पत्रकार ई. पिरियोन ने उसका प्राक्कथन लिखा। उसकी भाषा व शैली से अभिभूत होकर उन्होंने लिखा कि यह एक माहकाव्य है, दैवी मंत्रोच्चार है, देशभक्ति का दिशाबोध है। यह पुस्तक हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देती है, क्योंकि महमूद गजनवी के बाद 1857 में ही हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर समान शत्रु के विरू˜ यु˜ लड़ा। यह सही अर्थों में राष्ट्रीय क्रांति थी। इसने सि˜ कर दिया कि यूरोप के महान् राष्ट्रों के समान भारत भी राष्ट्रीय चेतना प्रकट कर सकता है।’’