प्रकाशित किया और इस संकलन के लिए उन्होंने ‘प्रथम भारतीय स्वातंत्र्य समर 1857-59’ जैसा शीर्षक ही अपनाया। इधर सन् 1857 की घटना के स्वरूप को लेकर आर.सी. मजूमदार और उनके शिष्य एस.बी.चैधरी में जबरदस्त बौ˜िक बहस छिड़ गई, जिसका समापन करने के लिए एस.बी.चैधरी ने सन् 1965 में ‘थ्योरीज आॅन इंडियन म्युटिनी’ नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक में उन्होंने सन् 1857 से अब तक इस घटना के स्वरूप के बारे में जितने मत प्रतिपादित हुए थे और नामकरण किए गए थे, उन सभी की समीक्षा की। अंत में उन्हांेने सावरकर द्वारा प्रस्तुत चित्रण और नामकरण को ही तथ्यों की कसौटी पर सही ठहराया।
यह सावरकर की ऐतिहासिक दृष्टि की भारी विजय थी। सन् 1909 में प्रकाशित प्रथम गुप्त संस्करण की भूमिका में सावरकर ने लिखा था कि यद्यपि उन्हें इंडिया आॅफिस लाइबे्ररी व नेशनल म्यूजियम
यद्यपि पुस्तक पर लेखक का नाम ‘एक भारतीय राष्ट्रभक्त’ छपा था; किंतु श्री पिरियोन द्वारा लिखित इस प्राक्कथन को फ्रेंच पत्रिका ‘ले कोरियर’ ने अपने 25 जुलाई, 1910 के अंक में छाप दिया। ब्रिटिश कोप से घबराकर फ्रांस की सरकार ने पत्रिका के उस अंक को ही प्रतिबंधित कर दिया।
10 मई, 1910 को 1857 की वर्षगांठ के अवसर पर एक चित्रमय पोस्टकार्ड जारी किया गया, जिसमें 1857 के क्रांति संदेश के साथ रानी लक्ष्मीबाई का चित्र छापा गया। चित्र के नीचे सूचना छापी गई-‘1857