लाइब्रेरी में केवल ब्रिटिश सरकार के दस्तावेजों एवं ब्रिटिश लेखकों की पुस्तकों पर ही अवलंबित रहना पड़ा, किंतु उस पूर्वग्रह-युक्त विशाल सामग्री में भी उन्हें ‘सिपाही विद्रोह’ के परदे के भीतर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य समर के स्पष्ट दर्शन तथ्यों में से कैसा नया चित्र उभर आता है, इतिहास-लेखन के क्षेत्र में उसका यह अत्युत्तम उदाहरण है। इसीलिए सावरकर की पुस्तक दो-दो स्वातंत्र्य समरों (1814 व 1943) का प्रेरणा-स्त्रोत बन गई।
देवेन्द्र स्वरूप
ओ हुतात्माओं !
स्वतंत्रता संग्राम आरंभ हो एक बार
पिता से पुत्र को पहुंचे बार-बार
भले हो पराजय यदा-कदा
पर मिले विजय हर बार।
आज 10 मई है। 1857 के स्मरणीय वर्ष में आज के दिवस ही, ओ हुतात्माओ! आपके द्वारा भारतवर्ष की रणभूमि में स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम अभियान का सूत्रपात किया गया था। अपनी पतनकारी दासता के भाव से जाग्रत हो
का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक को पाने के लिए मैडम बी.आर. कामा को पेरिस क ेपते पर पत्र लिखें या न्यूयाॅर्क की एफ.एच. पब्लिकेशन कमेटी का पत्र लिखें।
अंगे्रज बुद्विजीवियों, राजनीतिज्ञों में भी इस पुस्तक को पढ़ने की उत्कंठा जाग्रत
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हुई । वे कैसे भी पुस्तक की प्रति प्राप्त करके अपने मित्रों को एक अलभ्य उपहार के नाते भेंट करते। ऐसे ही अंगे्रज मित्र सर चाल्र्स क्लीवलैंड से खिलाफत आंदोलन के प्रसिद्व नेता मुहम्मद अली को यह पुस्तक पढ़ने को मिली थी।
सन् 1910 में भारतीय