हमारी मातृभूमि ने अपना खड्ग निकाल लिया था और बेड़ियों को भंग करते हुए अपनी मुक्ति और सम्मान हेतु प्रथम प्रहार किया था। आज ही के दिवस ’मारो फिरंगी को’ का रणघोष कोटि-कोटी कंठों से गूंज उठा था। आज ही के दिवस मेरठ के सिपाहियों ने भयानक विद्रोह में शामिल होते हुए दिल्ली की ओर कूच किया था और सूर्य के प्रकाश में झिलमिलाते यमुना जल के दर्शन किए थे, और उन ऐतिहासिक पलों को आत्मसात् किया था तथा प्राचीन युग का अवसान कर नए युग का उदय किया था और ‘‘एक ही पल में अपने नेता, अपने घ्वज तथा एक कारण को प्राप्त कर लिया था और सैनिक विद्रोह को एक राष्ट्रीय व धार्मिक संग्राम में परिवर्तित कर दिया था।’’
ओ हुतात्माओ! समस्त सम्मान आपको प्राप्त हों, क्यांेकि जाति के संरक्षण व सम्मान के लिए आपने उस समय क्रांति की कठोर अग्निपरीक्षा को सहन किया जब इस पावन भूमि के धर्मों पर
क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश दमन-चक्र घूमा। वीर सावरकर लंदन में गिरफ्तार करके भारत लाए गए और उन्हें दो जन्मों का कारावास दंड देकर काला पानी (अंडमान) भेज दिया गया। भारत में भी बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों की धर-पकड़ हुई। बड़ी संख्या में उन्हें अंडमान टापू भेज दिया गया। इस आघात से थोड़ा संभलते ही मैडम कामा, लाला हरदयाल एवं वीरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्याय आदि क्रांतिकारियों ने ‘1857 का भारतीय स्वातंत्र्य समर’ का अंग्रेजी में दूसरा संस्करण प्रकाशित किया। पहला संस्करण तो निःशुल्क वितरित