की ओर उंगली उठाता और कहता, ‘‘ भारत दासता का अधिकारी है। वह दासता में ही प्रसन्न है, क्यांेकि 1857 में भी अपने हित और अपने सम्मान की रक्षा हेतु वह उठ खड़ा नहीं हुआ।’’
इसीलिए आज के दिवस को ओ हुतात्माओं! आपकी प्रेरणादायी स्मृति को समर्पित करते हैं। आज ही के दिन आपने एक नवीन ध्वज उठाया था, जिसे ऊंचा रखना है; एक मिशन का उद्घोष को अंगीकार करते हैं; हम आपके ध्वज की उपासना करते हैं; ‘विदेशी को भगाने’ के उस कठिन मिशन को जारी रखने के लिए हम दृढ़-संकल्प हैं जिसका आपने क्रांतिकारी युद्ध की पैगंबरी गर्जनाओं के बीच उद्घोष किया था। हां, यह एक क्रांतिकारी युद्ध था, क्यांेकि 1857 का संग्राम तब तक नहीं थमेगा जब तक कि क्रांति न हो जाए, दासता को धूल मंे न मिला दिया जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए और स्वतंत्रता को सिंहासनारूढ़ न कर लिया जाए। जब
के मन पर सावरकर की रचना की गहरी छाप बैठी हुई थी। वे उसे दूसरे स्वातंत्र्य समर का पथ-प्रदर्शक मानते थे। इसलिए उन्होंने ‘गदर’ पत्रिका के उर्दू एवं पंजाबी संस्करणों में उस पुस्तक के अंशों को धारावाहिक छापना आरंभ कर दिया। सार्वजनिक सभाओं में भी उनका वाचन किया जाता। इस प्रकार इस पुस्तक के उर्दू व पंजाबी अनुवाद भी तैयार हो गए। सावरकर ने जो आशा की थी सन् 1857 का इतिहास लिखने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य देशभक्तों को द्वितीय स्वातंत्र्य समर की प्रेरणा व संगठन