सौगंध, नहीं। भारतीय राष्ट्र की ऐतिहासिक निरंतरता भंग नहीं हुई है। 10 मई, 1857 को समाप्त नहीं हो गया और न ही यह तब तक समाप्त होगा जब तक कि ऐसी कोई 10 मई नहीं आती है, जो हमारे संकल्प के साकार होने की साक्षी हो; जो हमारे सुंदर भारत के शीर्ष पर विजय का जगमगाता मुकुट अथवा
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बलिदान की आभा को देख ले।
किंतु हे गरिमामय हुतात्माओ! अपने पुत्रों के इस पावन संग्राम में सहायता करो। अपनी प्रेरक उपस्थिति से हमारी सहायता करो। अनगिनत क्षुद्र स्वार्थों से विदीर्ण होकर हम भारत माता की महान् एकता को कभी भी साकार नहीं कर सकेंगे। हमारे कर्णों में वह मंत्र उच्चरित करो, जिसके जादू से आपने एकता के रहस्य को प्राप्त कर लिया था। बताओ कि किस प्रकार फिरंगी शासन छिन्न-भिन्न हो गया था और हिंदुओं-मुसलमानों की आम सहमति से स्वदेशी सिंहासन स्थापित हो गए थे। किस
पुस्तक के प्रकाशन की कहानी उनके एक अनन्य सहयोगी एवं प्रसिद्व समाजवादी नेता राजाराम शास्त्री के शब्दों में ही कहना ठीक रहेगा। ‘अमर शहीदों के संस्मरण’ नामक अपनी रचना में राजाराम शास्त्री लिखते हैं
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‘‘वीर सावरकर द्वार लिखित’ 1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक ने भगत सिंह को बहुत अधिक प्रभावित किया था। यह पुस्तक भारत सरकार द्वारा जब्त कर ली गई थी। मैंने इस पुस्तक की बहुत प्रशंसा सुनी थी और इसे पढ़ने का बहुत ही इच्छुक था। पता नहीं कहां से भगत सिंह