प्रकार मातृभूमि के उच्चतर प्रेम ने जाति और नस्लों के अंतर को दूर कर दिया था। किस प्रकार पूज्य और पूजनीय बहादुरशाह ने समस्त भारतवर्श में गौ वध को प्रतिबंधित कर दिया था। किस प्रकार दिल्ली के सम्राट् को तोप-गर्जना की प्रथम सलामी के पष्चात् श्रीमंत नाना साहब ने द्वितीय सलामी को अपने लिए आरक्षित कर लिया था। किस प्रकार आपने मातृभूमि के ध्वज तले संगठित होकर समस्त विष्व को अंचभित कर दिया था और अपने शत्रुओं को भी यह कहने के लिए बाध्य कर दिया था कि इतिहासकारों व प्रशासकों को भारतीय सैन्य-क्रांति द्वारा सिखाए गए अनेक पाठों में कोई भी इस चेतावनी से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है-‘‘अब ऐसी क्रांति संभव है, जिसमें ब्राह्यण व शुुद्र तथा हिंदू-मुसलमान सभी हमारे विरूद्ध एक साथ संगठित हों और यह मानना सुरक्षित नहीं है कि हमारे आधिपत्य की शांति व स्थिरता बहुत सीमा तक उस महाद्वीप पर निर्भर
को यह पुस्तक प्राप्त हो गई थी। वह एक दिन इसे मेरे पास ले आए। जिससे ली होगी उसे जल्द वापस करनी होगी, इसलिए वह मुझे बहुत कहने पर देने को तैयार नहीं हो रहे थे। पर जब मैंने जल्द-से-जल्द पढ़कर उसे अवश्य लौटा देने का पक्का वायदा किया, तब उन्होंने वह मुझे केवल 3 घंटे के लिए पढ़ने को दी। उसको मैं कभी नहीं भूल सकता। मैंने एम वक्त खाना नहीं खाया और रात-दिन उसे पढ़ता ही रहा। पुस्तक ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया। भगत सिंह के अपने पर मैंने