खड़ा हो गया। सन् 1857 का यथार्थ क्या है? क्या वह मात्र एक आकस्मिक सिपाही विद्रोह था? क्या उसके नेता अपने तुच्छ स्वार्थों की रक्षा के लिए अलग-अलग इस विद्रोह में कूछ पड़े थे? या वह किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक सुनिश्चित प्रयास था? यदि हां, तो उस योजना में किसका मस्तिष्क कार्य कर रहा था? योजना का स्वरूप क्या था? क्या सन् 1857 एक बीता हुआ बंद अध्याय है या भविष्य के लिए प्रेरणादायी जीवंत यात्रा? भारत की भावी पीढ़ियों के लिए 1857 का संदेश क्या है? आदि-आदि। सावरकर ने इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए शोध करने का निश्चय किया। ब्रिटिश दस्तावेजों के आगा इंडिया आॅफिस लाइब्रेरी में प्रवेश पा लिया। लगभग डेढ़ वर्ष तक वे इंडिया आॅफिस लाइब्रेरी और ब्रिटिष म्यूजियम लाइब्रेरी में सन् 1857 संबंधी दस्तावेजों एवं ब्रिटिष लेखन के महासमुद्र में डुबकियां लगाते रहे। जातीय
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अहंकार और विद्वेष-जनित
को उद्वेलित कर दिया। यह एक प्रकार से बर्रो के छत्ते में ढेला मारने के समान था।
सन् 1857 की पचासवीं वर्षगांठ को ब्रिटेन ने विजय दिवस के रूप में मनाया। ब्रिटिश समाचार-पत्रों ने विशेषांक निकाले, जिनमें ब्रिटिश शौर्य का बखान और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की भत्र्सना की गई। 6 मई को लंदन के प्रमुख दैनिक ‘डेली टेलीग्राफ’ ने मोटे अक्षरों में शीर्षक छापा-‘पचास वर्ष पूर्व इसी सप्ताह शौर्य प्रदर्शन से हमारा साम्राज्य बचा था’। जले पर नमक छिड़कने के लिए लंदन में एक नाटक खेला