बताओ कि किस प्रकार भारत के भयावह विरोध की प्रतीक चपाती गांव-गांव और घाटी-घाटी घूमी थी, जिसने राष्ट्र की समूची प्रज्ञा को अपने संदेश की अस्पश्टता से प्रज्वलित कर दिया था। तत्पश्चाात् हमें श्रवण करने दें उस दहाड़ती हुई गर्जना का, जिसके साथ ज्वालामुखी अंततः फूट पड़ा था अपने समस्त ध्वंसकारी बल के साथ और जो अपने रक्त-तत्व लावा


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प्रवाह में सभी को छिन्न-भिन्न करता, जलाता और भस्म करता चला गया था। एक माह के भीतर रेजीमेंट-पर-रेजीमेंट, रजवाड़ों-पर-रजवाड़े, नगर-पर-नगरए सिपाही, पुलिस, जमींदार, पंडित, मौलवी और बहुमखी क्रांति ने घंटानाद कर दिया था और मंदिरों तथा मस्जिदों में एक ही घोष गूंज रहा था-मारो फिरंगी को!’ मेरठ जागा, दिल्ली जागी; बनारस, आगरा, पटना, लखनऊ, इलाहाबाद, जगदलपुर, झांसी, बांदा, इंदौर-सभी नगर जाग उठे-पेशावर से कलकत्ता और नर्मदा से हिमालय तक यह ज्वालामुखी के एक धधकते लावा के रूप में फूट पड़ा।


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थे। कुछ दिनों तक बराबर यह सिलसिला चलता रहा। इस पुस्तक को दो खंडों में प्रकाशित किया गया। प्रत्येक खंड की कीमत आठ आना रखी गई, फिर गुप्त रूप से इसे बेचने का प्रबंध हुआ। मुझे याद है कि मैंने इस पुस्तक को सर्वप्रथम राजर्षि श्री पुरूषोत्तमदास टंडन के हाथ बेचा था। इसके प्रकाशन से टंडन जी बहुत प्रसन्न हुए थे। इसके बेचने में सुखदेव ने बहुत अधिक परिश्रम किया था; (पृ. 89-90)

सन् 1929-30 में भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों की गिरफ्तारी के समय


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