तत्पश्चात्, ओ हुतात्माओ! हमें उन छोटी-बड़ी त्रुटियों के बारे में बताओ जो आपको इस महान् परीक्षण के दौरान हमारे सेनानियों में मिली। परंतु सर्वोंपरि, उस सर्वाधिक घातक-नहींए, उस एकमात्र कमी की ओर भी इंगित करो, जो हमारे राष्ट्र के हित में संग्राम में शामिल होने के मार्ग पर चलने से इन्कार कर दिया। करो कि हिंदुस्तान की पराजय का एकमात्र कारण हिंदुस्तान था, कि शताब्दियों कि निद्रा से जागकर माता शत्रु पर प्रहार करने को उठी; पर जब उसका दाहिना हाथ फिरंगियों को मौत के घाट उतार रहा था, उसका वाम हस्त शत्रु पर नहीं बल्कि उसी के मस्तक पर प्रहार कर रहा थां इसीलिए माता डगमगाई और पचास वर्षों की अवश्यंभावी मूच्र्छा में धराशायी हो गई।

पचास वर्ष व्यतीत हो गए, परंतु हे अशांत शूरवीरों ! विश्वास करो कि तुम्हारी हीरक जयंती तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति किए बिना नहीं संपन्न होगी। हमने तुम्हारी गर्जना


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उनमें से अधिकांश के पास इस पुस्तक की प्रतियां पुलिस को प्राप्त हुई। सन् 1942 में जर्मनी में फ्रेंड्स आॅफ इंडिया सोसाइटी ने भी इस पुस्तक का एक संस्करण प्रकाशित किया।

आजाद हिंद फौज के निर्माण में ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ पुस्तक की भारी भूमिका रही। आजाद हिंद फौज के मूल संस्थापक रासबिहारी बोस क्रांतिकारी बोस क्रांतिपथ पर सावरकर को अपना गुरू मानते थे। जापान में शरण लेने के बाद भी वे द्वितीय विश्व यु˜ तक सावरकर से लगातार पत्राचार करते रहे। वे जापान में हिंदू महासभा


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