करने में ही इतिहास-लेखक का वास्तविक कौशल होता है। परंतु कुछ इतिहासकार यहां भ्रमित होकर इस वर्गीकरण में आकस्मिक कारणों को प्रधान कारण का स्वरूप दे देते हैं। किसी घर को आग लगने पर उस आग को लगानेवाले व्यक्ति को छोड़ उसके हाथ की माचिस की तीली पर सारा आरोप लादनेवाले मूर्ख न्यायधीष की तरह वह इतिहासकार भी हास्यास्पद हो जाता है। आकस्मिक कारण को ही प्रधान कारण मानकर किसी ऐतिहासिक घटना का इतिहास लिखने से उस घटना न कुछ कारणों से घटित हुई देखकर उस घटक और उसमें सम्मिलित व्यक्तियों के लिए तुच्छ भावना उत्पन्न होने लगती है। इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं का--और विशेषकर क्रांतिकारी घटनाओं का-इतिहास लिखते समय उसका केवल वर्णन लिखने से उकसी समुचित कल्पना प्रस्तुत करना संभव नहीं होता या उसका उद्गम उसके निमित्त कारण तक ही खोजकर लौट आने से भी उसका यथार्थ स्वरूप
जनवरी 1947 में महान् एतिहासिक गं्रथ का प्रथम कानूनी संस्करण प्रकाशित हो पाया।
10 जनवरी, 1947 का जी.एम.जोशी ने जब इस पुस्तक के प्रथम अधिकृत कानूनी संस्करण की भूमिका में इस पुस्तक का रोमांचकारी इतिहास लिखा तब तक पुस्तक की मूल मराठी पांडुलिपि उपलब्ध नहीं हुई थी और यह मान लिया गया था कि सावरकर द्वारा 1901 में लिखित सिक्ख इतिहास की पांडुलिपि के समान यह भी सदा के लिए खो गई है। जी.एम.जोशी लिखते हैं कि ‘‘सावरकर की गिरफ्तारी के बाद मूल मराठी