पूर्वग्रही ब्रिटिष लेखन में छिपे सत्य को उन्होंने खोज निकाला। 1857 के वास्तविक स्वरूप का साक्षात्कार करने में वे सफल हुए। उन्होंने 1857 को एक मामूली सिपाही विद्रोह के गड्ढे से उठाकर भारतीय स्वातंत्र्य समर के उच्च सिंहासन पर प्रतिष्ठित कर दिया। अपनी इस शोध-साधना को उन्होंने मराठी भाषा में निब˜ किया।
इस बीच लंदन में 10 मई, 1908 को 1857 की क्रांति की वर्षगांठ का आयोजन किया गया। इस अवसर के लिए सावरकर ने ‘व् डंतजले’ (ऐ शहीदो) शीर्षक से अंगे्रजी में चार पृष्ठ लंबे पैंफ्लेट की रचना की, जिसका इंडिया हाउस में आयोजित कार्यक्रम में तथा यूरोप व भारत में बड़े पैमाने पर वितरण किया गया। इंडिया आॅफिस लाइबे्ररी और ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी में लगातार एक वर्ष तक बैठने के कारण यह तो छिपा नहीं था कि सावरकर 1857 का अध्ययन कर रहे हैं; परंतु उनका अध्ययन किस दिशा
गया, जिसमें रानी लक्ष्मीबाई एवं नाना साहेब जैसे श्रेष्ठ नेताओं को हत्यारा व उपद्रवी बताया गया। सावरकर के नेतृत्व में भारतीय देशभक्तों ने इस अपमान का उत्तर देने के लिए 10 मई को सन् 1857 की पचासवीं वर्ष गांठ बड़ी धूमधाम से मनाई। भारतीय युवकों ने 1857 की स्मृति में अपनी छाती पर चमकदार बिल्ले लगाए। उन्होंने उपवास रखा, सभाएं कीं, जिनमें स्वतंत्र होने तक लड़ाई जारी रखने की प्रतिज्ञा ली गई। भारतीय देशभक्ती के इस सार्वजनिक प्रदर्शन से शासकीय अहंकार में डूबे अंग्रेज