विक्षोेभक तत्त्व के सिवाय किसी अन्य क्षुद्र व क्षणिक नींव पर क्रांति के भव्य भवन का निर्माण असंभव है। पर क्रांति की नींव का यह तत्त्व जिस प्रमाण में पवित्र या अपवित्र होता है उसी प्रमाण में उस क्रांति के कार्यकर्ता-व्यक्ति के स्वरूप और कृत्य भी पवित्र या अपवित्र होते हैं। हेतु से जैसे कृत्य की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु की परीक्षा सामान्य व्यवहार में की जाती है उसी तरह इतिहास में भी व्यक्ति या राष्ट्र के हेतु से उसके कृत्य का स्वरूप निश्चित होता है। यह कसौटी यदि छोड़ दे तो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को मारना या किसी एक सेना द्वारा दूसरी सेना को मारने में कोई भेद नहीं रहेगा। साम्राज्य के लिए सिकंदर की चढ़ाई और इटली की स्वतंत्रता के लिए गैरीबाल्डी द्वारा की गई चढ़ाइयां दोनों समान हेतु समझ लेना आवश्यक है उसी तरह हर क्रांति का यथोचित परीक्षण विवेचन करने के लिए


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किंतु वीर सावरकर के जीवनीकार धनंजय कीर के अनुसार, ‘‘भारत की स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद वह पांडुलिपि सावरकर के पास बड़े नाटकीय ढंग से वापस लौट आई।’’ उनके अनुसार, ‘‘अभिनव भारत’ के एक सदस्य गोआ निवासी जे.डी.एस. कोरिन्हो फ्रांस स्थित पुर्तगाली दूतावास की सहायता से उन उथल-पुथल के दिनों में उस पांडुलिपि को लेकर पहले पुर्तगाल और वहां से अमेरिका पहुंच गए। वे वाशिंगटन के एक काॅलेज में शिक्षक हो गए। तमाम कठिनाइयों और संकटों से जूझकर भी उन्होंने


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