नहीं थी-वह बाजार क्या यों ही लगा और यों ही उठ गया? ऐसा नहीं हो सकता। ज्ञात होना बहुत कठिन है, इसलिए नहीं अपितु वह ज्ञात हुआ, यह मानना अपने हित में न होने के कारण इस मुद्दे की ओर अंगे्रज़ इतिहासकारों ने दुर्लक्ष्य किया है। परंतु इस दुर्लक्ष्य से भी अधिक उलझानेवाली और सन् 1857 के क्रांतियुद्ध के स्वरूप को सर्वाधिक भ्रष्ट करनेवाली दूसरी युक्ति या चूक विजातीय एवं उनकी धूल ओढ़नेवाले स्वजातीय इतिहासकारों ने जो की है, वह यह है कि इस सन् 1857 के प्रलय का कारण दूसरा कुछ नहीं, मुट्ठी भर लालची लोगों द्वारा उठाई गई कारतूसों की अफवाह है। अंगे्रज़ इतिहासकार और अगे्रज़ों की कृपा पर पले-बढ़े एक देसी ग्रंथकार कहते हैं-कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसी ने नहीं की।


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जोशी एवं बाल सावरकर द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई पुस्तक-गाथा को वीर सावरकर ने देख लिया होगा। यहां कुछ प्रश्न खड़े होते है कि यदि मूल पांडुलिपि मैडम कामा के बैंक लाॅकर में सुरक्षित थी तो वह कोरिन्हो के पास कब, कैसे पहुंची ? यदि कीर के अनुसार, मई 1917 के पूर्व अड़तीस वर्ष वह कोरिन्हो के पास रही तो इसका अर्थ है कि सन् 1911 के लगभग ही वह उन्हें मिल गई होगी। मैडम कामा सन् 1935 में भारत आई और 1916 में अपनी मृत्यु तक एक वर्ष तक यहां रहीं।


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