एक ने कहा, इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया। ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खां का समाज जमा हुआ और विद्राह हो गया।
कारतूसों की बात पर लोगों ने अध्ंापरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा, परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार उत्पन्न करने का कैसा सुदीर्घ प्रयास चल रहा था, यह इससे स्पष्ट होता है। सन् 1857 जैसी प्रचंड क्रांति ऐसे कारणों से उत्पन्न होगी, यह कहनेवाले मंद या कुटिल बुद्धि के लोगों को क्रांति एक अविवेकी मूर्खों का समाज लगता है; लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यदि सन् 1857 की क्रांति मुख्यतः कारतूसों के कारण ही प्रदीप्त हुई तो उसमें नाना साहब, दिल्ली का बादशाह, झांसी की रानी या रोहिलखंड का खान बहादूर कैसे सम्मिलित हुए? इनको अंगे्रजी सेना में नौकरी करनी नहीं थी या घर
उन दिनों वीर सावरकर जेल के बाहर रत्नागिरी जिले में स्थानब˜ जीवन व्यतीत कर रहे थे। क्या उन दिनों मैडम कामा और उनका कभी कोई संपर्क नहीं हुआ? क्या मैडम कामा ने उन्हें पांडुलिपि कोरिन्हो को देने की बात नहीं बताई? जी.एम. जोशी के वर्णन से लगता है कि जानवरी 1947 तक बहुत खोजबीन के बाद भी उन पांडुलिपि का पता नहीं लग पाया था और उसे खोया हुआ मान लिया गया था। इसका अर्थ होता है कि एस समय तक वीर सावरकर को भी उस पांडुलिपि को कोई अता-पता नहीं था।