बैठे भी वह फौजी कारतूस तो तोड़ने ही होंगे, ऐसा आदेश भी किसी ने उन्हें नहीं दिया था। यदि यह विद्रोह केवल या मुख्य रूप से कारतूसों की चरबी से ही हुआ था तो हिंदुस्तान के अंगे्रज गवर्नर द्वारा उसे उपयोग में न लाने का आदेश देते ही उसे तुरंत ठंडा हो
1857 का स्वातंत्र्य समर - 36
जाना चाहिए था। पर सिपाही अपने हाथ से अपने कारतूस बना लें, ऐसी अनुमति मिलने पर भी उसका उपयोग न कर या सेना की नौकरी छोड़ सारी किटकिट से परे न हटकर सेना के सिपाहियों ने ही नहीं बल्कि सेना से जिनका दूर का भी संबंध नहीं था-ऐसे लाखों लोगों ने, राजा-महाराजाओं ने अपने प्राण रणभूमि पर क्यों अर्तित किए? फौजी और सामान्य जन, राजा और रंक, हिंदू और मुसलमान-इन सबको एक साथ आवेशित करनेवाली बातें क्षुद्र नहीं होती, उसके मूल में होते हैं तात्त्विक कारण।
कारतूसों का डर ही विद्रोह का प्रमुख
क्या यह संभव है? दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि यदि मई 1949 में वापस मिली पांडुलिपि में दो अध्याय नहीं थे, क्योंकि वे ब्रिटिश गुप्तचरों द्वारा चोरी कर लिये गए थे, तो यह चोरी कब हुई होगी? प्रतिबंध का आदेश 23 जुलाई, 1909 को जारी हुआ। अंगे्रजी अनुवाद उसके पूर्व प्रकाशित हो चुका था। अंगे्रजी अनुवाद मराठी मूल के आधार पर ही हुआ होगा। क्या हम यह मान लें कि मराठी पांडुलिपि के दो अध्यायों की चोरी अंगे्रजी अनुवाद पूरा हो जाने के बाद हुई? अंतिम प्रश्न यह उठता