लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में नवाब पर आ पड़े दुःखों को कहते जार-जार रोते थे, इसकी कल्पना आपको नहीं हैं। और ऐसे आंसु बह जाने के बाद, जैसे स्वयं पर ही क्रूर प्रहार हो रहे हों, ऐसा मानकर वाजिद अली शाह के अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा कितने सिपाही प्रतिदिन कर रहे थे, यह भी आपको ज्ञात नहीं ं ।’’
इन सिपाहियों को उससे सहानुभूति क्यों होने लगी और जिन्होंने नवाब को जन्म से नहीं देखा था उनकी आंखें और कंठ क्यों भर आए? अतः अवध का राज्य हड़पने से विद्रोह नहीं उपजा अपितु इन राज्यों को हड़पने में जिस तत्त्व का हनन हो रहा था
1857 का स्वातंत्र्य समर - 37
उसके कारण विद्रोह उपजा। कारतूसों का डर या अवध का राज्य हड़पना गौण औा आकस्मिक कारण थे। इन्हीें को प्रधान कारण मानने से सन् 1857 की क्रांति का वास्तविक स्वरूप कभी भी ज्ञात नहीं हो पाएगा।
इन निमित्त कारणों
1957 में 1857 की क्रांति की शताब्दी के अवसर पर पुनः यह असमंजस खड़ा हुआ कि उस घटना को क्या कहें-गदर, क्रांति या स्वातंत्र्य समर? वरिष्ठ इतिहासकार आर.सी.मजूमदार ने उसे ‘सिपाही विद्रोह’ कहा तो उन्हीं के शिष्य डाॅ, एस.बी.चैधरी ने उसे ‘जन विद्रोह’ का शीर्षक दिया। भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने उसे ‘1587 का विद्रोह’ कहा। भारत सरकार ने विवाद से बचने के लिए इतिहासकार एस.एन. सेन द्वारा
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लिखित पुस्तक में केवल ‘1587’ जैसा नपुंसक शीर्षक अपनाया।