में जा रहा है, इसका कुछ आभास इस पैंफ्लेट की काव्यमयी ओजस्वी भाषा 1857 के शहीदों के माध्यम से भावी क्रांति का आह्नान थी। सावरकर ने लिखा-‘‘10 मई, 1857 को शुरू हुआ यु˜ 10 मई, 1908 को समाप्त नहीं हुआ है, वह तब तक नहीं रूकेगा जब तक उस लक्ष्य को पूरा करनेवाली कोई अगली 10 मई आएगी। ओ महान् शहीदों! अपने पूत्रों के इस पवित्र संघर्ष में अपनी पे्ररणादायी उपस्थिति से हमारी मदद करो। हमारे प्राणों में भी जादू का वह मंत्र फूंक दो जिसने तुमको एकता के सूत्र में गूंद दिया था।’’ इस पैंफ्लेट के द्वारा सावरकर ने 1857 को एक मामूली सिपाही विद्रोह की छवि से बाहर निकालकर एक सुनियोजित स्वातंत्र्य यु˜ के आसन पर प्रतिष्ठित कर दिया। 1910 में सावरकर की गिरफ्तारी के बाद उनपर राजद्रोह का मुकदमा चला और उन्हें पचास वर्ष लंबे कारावास की सजा देने वाले निर्णय में ‘ऐ शहीदों’ पैंफ्लेट की उपर्युक्त पंक्तियां ही उद्धृत की गई थीं।


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तिलमिला उठे। कई जगह भारतीय युवकों से झड़प की नौबत आ गई। हरनाम सिंह एवं आर. एम. खान जैसे युवकों को छाती पर से बिल्ला न हटाने की जिद के कारण वि़द्यालय से निष्कासन झेलना पड़ा। अंगे्रजों को अपने ही घर में भारतीय राष्ट्रवाद के उग्र रूप का साक्षात्कार हुआ।

किंतु इस प्रकरण ने सावरकर को अंदर से झकझोर डाला। उनके मन में प्रश्नों का झंझावत खड़ा हो गया। सन् 1857 का यथार्थ क्या है? क्या वह मात्र एक आकस्मिक सिपाही विद्रोह था? क्या उसके नेता अपने तुच्छ स्वार्थों


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