बंधुओं, परमेश्वर की दी हुई सौगात में सबसे श्रेष्ठ सौगात स्वराज्य (ैवअमतमपहद) ही है। यह ईश्वरीय सौगात जिसने हमसे छल से छीन ली है उस अत्याचारी राक्षस को वह बहुत दिन प्रचेगी क्या? यह ईश्वरीय इच्छा के विरूद्व किया गया कृत्य क्या जय प्राप्त करेगा? नहीं, नहीं। अंगेजों ने इतने जुल्म ढाए हैं कि उनके पाप के घड़े पहले ही लबालब भरे हुए हैं। और


1857 का स्वातंत्र्य समर - 39

उसमें हमारे पवित्र धर्म का नाष करने की कुबुद्धि और समा गई है। अब आप अभी भी शांति से बैठे रहेंगे क्या? आप शांति से बैंठे, यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। क्योंकि सारे हिंदुओं और मुसलमान के हृदय में उसी की इच्छा उत्पन्न हुई हैं-परमेश्वर की इच्छा-और आपके पराक्रम से जल्दी ही उनका ऐसा सर्वनाश हो जाएगा कि अपने हिंदुस्तान में उनका छिलका, टुकड़ा भी नहीं रहेगा। छोटे-बड़े के सारे भेदभाव भुलाकर इस सेना में


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ओ हुतात्माओ! समस्त सम्मान आपको प्राप्त हों, क्यांेकि जाति के संरक्षण व सम्मान के लिए आपने उस समय क्रांति की कठोर अग्निपरीक्षा को सहन किया जब इस पावन भूमि के धर्मों पर बलात् व कुटिलतापूर्ण धर्मांतरण का संकट छा रहा था। जब पाखंडी ने अपने मित्रवत् आवरण को उतार फंेका था और विश्वासघाती शत्रु के घृण्ति रूप में नग्न खड़ा हो गया था तथा संधियों का उल्लघंन करने लगा था, मुकुटों को भंग करने लगा था और हमारी कृपालू मातृभूमि का उसकी निष्ठा के लिए उपहास करने लगा था, जिससे उसने मिथ्याभाषी गोरांे के ढोंग का विश्वास किया था।


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