सब ओर समता का राज हो। क्योंकि पवित्र धर्मयुद्ध में जो वीर स्वधर्म के लिए अपनी तलवार म्यान के बारह निकालते हैं वे सब समान योग्यता के होते हैं। वे भाई-भाई हैं। उनमें किसी तरह का भेद नहीं है। इसलिए फिर से एक बार मैं सारे हिंदू बंधुओं का आह्यान करता हूं-उठो और इस परम ईश्वरीय और दिव्य कर्तव्य के लिए रण-मैदान में कूद पड़ो।’’
ये तत्त्वरत्न देखकर जिसे इस क्रांतियुद्ध की ओजस्विता भासित नहीं होगी उसे या तो मंदबुद्धि या दुर्बुदि होना चाहिए। ईष्वर-प्रदत्त अधिकारों के लिए लड़ना मनुष्यमात्र का कर्तव्य है और स्वधर्म एवं स्वराज्य के लिए लड़ने को ही उस मय के भारतीय शूरों ने अपने शस्त्र निकाले थे, यह सिद्ध करने के लिए इससे सबल साक्ष्य और क्या दिया जा सकता है! भिन्न-भिन्न स्थानों और भिन्न-भिन्न कालों में निकाले गए ये घोषणापत्र इस क्रांतियुद्ध की मीमांसा करने के लिए एक अक्षर भी और अधिक लिखने
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हे बलिदानियों! तभी आपने माता को जाग्रत किया, प्रेरित किया और माता के हेतु ही ‘मारो फिरंगी को’ के रणघोष के साथ भयावह व विशाल रणभूमि की ओर प्रस्थान किया। आपके ध्वज पर ईश्वर और हिंदुस्तान का पवित्र मंत्र था। संग्राम में आपने नेक कार्य किया, क्यांेकि भले ही आपका रक्तपात होने से बच जाता, लेकिन दासता का दंश कहीं अधिक गहरा होता। आत्मबलहीन धैर्य की अभिशापित श्रंखला में एक और कड़ी जुड़ जाती। समस्त विश्व घृणा से हमारे राष्ट्र की ओर उंगली उठाता और कहता, ‘‘