1857 का स्वातंत्र्य समर - 40
नामक ऐहिक सामथ्र्य की तलवार स्वधर्म नामक पारलौकिक साध्य के लिए हमेशा बाहर निकली रहनी चाहिए। यह प्राचीन जनों के मन का रूझान इतिहास में पग-पग पर दिखेगा। प्राचीन काल में हुई क्रांतियों को धार्मिक स्वरूप क्यों मिलता है, या यह कहें कि धार्मिक पवित्रता के या धर्म-संलग्नता के सिवाय प्रचंड क्रांति का होना-यह बात प्राचीन इतिहास में बिल्कुल भी क्यों ज्ञात नहीं है, इसका बीज भी धर्म के इस विश्व व्यापक स्वरूप में ही है। हिंदुस्थान के इतिहास में आज तक अखंड रूप से व्यक्त होते आए स्वराज्य एवं स्वधर्म के साधन और साध्य तत्त्व इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में भी व्यक्त हुए, इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है। दिल्ली के बादशाह द्वारा पहले-पहल निकाले गए घोषणापत्र का उल्लेख पहले किया गया है। उसके बाद जब दिल्ली को अंग्रेजी सेनाओं ने घेर लिया और युद्ध घमासान हो गया तब बादशाह ने
युद्ध की पैगंबरी गर्जनाओं के बीच उद्घोष किया था। हां, यह एक क्रांतिकारी युद्ध था, क्यांेकि 1857 का संग्राम तब तक नहीं थमेगा जब तक कि क्रांति न हो जाए, दासता को धूल मंे न मिला दिया जाए, दासता को धूल में न मिला दिया जाए और स्वतंत्रता को सिंहासनारूढ़ न कर लिया जाए। जब कभी कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता के लिए जाग्रत होता है; जब कभी स्वतंत्रता का बीज उसके पिता के लहू में अंकुरित होता है और जब कभी एक भी सच्चा पुत्र अपने पिता के रक्त का प्रतिरोध लेने के लिए जीवित, तब