हिंदुओं के लिए दूसरा घोषणापत्र जारी किया। उसमें वे कहते हैं-‘‘जीम राजगान वो रोसाए हिंद पर वाझे होके तुम बेहामा उजूः नेकी और फय्याजी में मुश्तईर उद्दईर हों ं ं ंखुदावंत ने तुमको ये मर्तबए आली और मुल्क और दौलत और हुकूमत इसी वास्ते बख्शी है कि तुम उन लोगों को, जो तुम्हारे मजहब में दखलंदाजी करें, गारद करों ं ं ं।’’ (हमें ईश्वर ने संपति, देश, अधिकार किस लिए दिए हैं? ये सभी केवल व्यक्ति से संबंधित सुख-भोग के लिए न होकर स्वधर्म-संरक्षण के पवित्र हेतु के लिए हैं।)
परंतु इस पवित्र एवं अंतिम हेतु के ये साधन कहां है? पहले दिए हुए घोषणापत्र के अनुसार परमेश्वर की सब सौगातों में अत्यंत श्रेष्ठ स्वराज की सौगात कहां है? दौलत कहां है? मुल्क कहां है? हुकूमत कहां है? गुलामी के प्लेग में यह सारी दैविक स्वतंत्रता मृतप्राय हो गई है। गुलामी का प्लेग किस तरह संहार कर रहा है,
तक ऐसे संग्राम का कभी अंत नहीं हो सकता। क्रांतिकारी युद्ध में कोई विराम नहीं है। स्वतंत्रता अथवा मृत्यु मिलने पर ही इसका अंत होता है। आपकी स्मृति से प्रेरित हम 1857 में आपके द्वारा आरंभ संग्राम को परिणति तक ले जाने को कृतसंकल्प हैं। हम अस्त्र-शस्त्रों के बल प्रथम अभियान के युद्धों के रूप में देखते हैं। इनमें मिली पराजय संग्राम की पराजय नहीं हो सकती है। क्या विश्व यह कहेगा कि भारत ने पराजय को अंतिम पराजय के रूप में स्वीकार कर लिया है? क्या सन् 1857 में बहाया गया